आत्म-विकास का लक्ष्य: संसार नहीं, आत्मोन्नति
प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में उन्नति करना चाहता है। कोई प्रातःकाल शीघ्र उठकर व्यायाम करता है, कोई उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन करता है, कोई नवीन कौशल प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो कोई अपने व्यवसाय अथवा सेवा में अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए सतत परिश्रम करता है। अधिकांश लोग अधिक धन, उच्च पद, उत्तम स्वास्थ्य अथवासमाज में सम्मान प्राप्त करने को ही आत्मोन्नति का लक्ष्य मानते हैं। इनमें कोई दोष नहीं है। पुरुषार्थ करना, अपनी योग्यताओं का विकास करना तथा जीवन को अधिक उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। किन्तु इसके साथ एक प्रश्न अत्यन्त विचारणीय है—
हम आत्मोन्नति क्यों करना चाहते हैं?
क्या केवल अधिक धन अर्जित करने के लिए?
क्या केवल पदोन्नति अथवा यश प्राप्त करने के लिए?
क्या केवल समाज में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए?
अथवा आत्मोन्नति का कोई इससे भी उच्च एवं दिव्य उद्देश्य है?
भगवद्गीता इस प्रश्न का अत्यन्त गम्भीर एवं जीवनोपयोगी उत्तर प्रदान करती है। भगवान् श्रीकृष्ण के अनुसार आत्मोन्नति का अर्थ केवल सांसारिक उपलब्धियों की वृद्धि नहीं है। उसका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अन्तःकरण का परिष्कार, चरित्र का निर्माण तथा आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होना है। जब मनुष्य अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध करता है, तभी उसका जीवन वास्तव में सफल एवं सार्थक बनता है।भगवद्गीता का निम्नलिखित श्लोक इस सत्य को अत्यन्त सरल शब्दों में प्रतिपादित करता है—
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
(भगवद्गीता ६।५)
भावार्थ :
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। यह श्लोक जीवन का एक अमूल्य सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। मनुष्य की उन्नति अथवा पतन का प्रधान कारण बाह्य परिस्थितियाँ नहीं, अपितु उसका अपना मन है। सामान्यतः मनुष्य अपनी असफलताओंके लिए भाग्य, समाज, परिस्थितियों अथवा अन्य व्यक्तियों को उत्तरदायी मानता है; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण हमें स्मरण कराते हैं कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारे अपने अन्तःकरण में ही विद्यमान है।
यदि मन संयमित, अनुशासित एवं सद्विचारों से युक्त है, तो वही हमें अध्ययन, परिश्रम, सत्यनिष्ठा, सदाचार तथा धैर्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। ऐसा मन हमारा परम हितैषी बन जाता है। किन्तु यदि वही मन आलस्य, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, भय अथवा अहंकार से आच्छादित हो जाए, तो वही हमें अधःपतन की ओर ले जाता है। अतः जीवन का प्रथम औरसबसे महत्त्वपूर्ण संघर्ष बाह्य संसार में नहीं, अपितु अपने ही मन के भीतर होता है। इसी कारण आत्मोन्नति का आरम्भ बाह्य परिवर्तन से नहीं, अपितु अन्तःकरण के परिष्कार से होता है।
शान्ति के बिना सफलता अधूरी है
वर्तमान युग में सफलता का मूल्यांकन प्रायः बाह्य उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है। विशाल भवन, विलासपूर्ण वाहन, उच्च वेतन, प्रतिष्ठित पद तथा सामाजिक प्रसिद्धि—इन सबको सफलता का मानदण्ड माना जाने लगा है। निस्सन्देह ये उपलब्धियाँ जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, किन्तु वे मनुष्य को स्थायी सुख एवं शान्ति प्रदान नहीं करसकतीं। हम देखते हैं कि अनेक धनवान व्यक्ति चिन्ता एवं तनाव से ग्रस्त रहते हैं। अनेक प्रतिष्ठित अधिकारी मानसिक अशान्ति का अनुभव करते हैं। अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन में भी एकाकीपन एवं असन्तोष विद्यमान रहता है। इसका कारण यही है कि बाह्य वैभव कभी भी आन्तरिक शान्ति का स्थान नहीं ले सकता।
भगवद्गीता का संदेश है कि वास्तविक सफलता मन की विजय से प्रारम्भ होती है। जिसके हृदय में शान्ति, सत्यनिष्ठा, धैर्य, करुणा, विनय तथा आत्मसंयम विद्यमान हैं, वही वास्तव में सफल है। धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन के साधन हो सकते हैं, किन्तु वे जीवन का परम लक्ष्य नहीं हैं। अतः आत्मोन्नति का उद्देश्य केवल बाह्य उन्नति न होकर आत्मिक विकास होना चाहिए। जब मनुष्य अपने चरित्र का निर्माण करता है, अपने मन को शुद्ध करता है और अपने जीवन को धर्ममय बनाता है, तभी वह वास्तविक अर्थों में स्वयं का उत्थान करता है। यही भगवद्गीता का दिव्य संदेश है और यही आत्मोन्नति का सच्चा प्रेरणास्रोत भी है।
आत्मोन्नति का शाश्वत दृष्टिकोण
भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता में आत्मोन्नति का एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जो मनुष्य को क्षणिक सफलता से ऊपर उठाकर शाश्वत कल्याण की ओर ले जाता है। वे कहते हैं—
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
(भगवद्गीता १५।८)
भावार्थ :
जैसे वायु पुष्पादि आश्रयों से गन्ध को ग्रहण करके अन्य स्थान पर ले जाती है, उसी प्रकार जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर को प्राप्त होती है, तब वह मन तथा इन्द्रियों को अपने साथ ले जाती है। यह श्लोक आत्मोन्नति के वास्तविक उद्देश्य को अत्यन्त स्पष्ट कर देता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि शरीर नश्वर है, किन्तु आत्मा अविनाशी है। मृत्युजीवन का अन्त नहीं, अपितु आत्मा की निरन्तर यात्रा का एक पड़ाव मात्र है। इस यात्रा में मनुष्य अपने साथ धन, सम्पत्ति, पद, प्रतिष्ठा अथवा सांसारिक वैभव नहीं ले जाता; वे सब इसी जगत् में रह जाते हैं।
जो वस्तु आत्मा के साथ चलती है, वह है—उसका चरित्र, संस्कार, ज्ञान, सद्गुण तथा आध्यात्मिक उन्नति। यही वास्तविक सम्पत्ति है, जो जन्म-जन्मान्तर तक मनुष्य का साथ देती है। जब मनुष्य अपने क्रोध पर विजय प्राप्त करता है, तब उसका अन्तःकरण अधिक निर्मल बनता है। जब वह दया, सेवा और सत्य का आचरण करता है, तब उसके संस्कारअधिक पवित्र होते हैं। जब वह विनम्रता, संयम और सदाचार का अभ्यास करता है, तब उसका व्यक्तित्व दिव्य गुणों से विभूषित होता जाता है। यही वास्तविक आत्मोन्नति है, जिसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रेरणा प्रदान करते हैं।
आन्तरिक सम्पदा का संचय
सामान्यतः मनुष्य अपना अधिकांश जीवन बाह्य सम्पत्ति अर्जित करने में व्यतीत करता है। परिवार के पालन-पोषण एवं समाज में अपने कर्तव्यों के निर्वाह के लिए धन आवश्यक भी है। धर्मसम्मत परिश्रम से अर्जित धन जीवन का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। किन्तु इसके साथ-साथ मनुष्य को अपनी आन्तरिक सम्पदा का भी संचय करना चाहिए। यह सम्पदा है—ज्ञान, आत्मसंयम, विनय, करुणा, धैर्य, सत्य, सन्तोष, श्रद्धा तथा सदाचार। यह ऐसा धन है जिसे कोई चोर चुरा नहीं सकता, कोई विपत्ति नष्ट नहीं कर सकती और जिसका मूल्य कभी कम नहीं होता। यही सम्पदा इस जीवन को भी पवित्र बनाती है और आत्मा की आगामी यात्रा में भी उसका साथ देती है।
तुलना नहीं, आत्मपरीक्षण
आज का मनुष्य निरन्तर दूसरों से अपनी तुलना करता रहता है। कोई धन की तुलना करता है, कोई पद की, कोई अंकों की, तो कोई प्रतिष्ठा की। आधुनिक साधनों ने इस प्रवृत्ति को और भी बढ़ा दिया है। इसका परिणाम प्रायः ईर्ष्या, असन्तोष, तनाव और मानसिक अशान्ति के रूप में सामने आता है।
भगवद्गीता इससे भिन्न मार्ग का उपदेश देती है। वह हमें दूसरों से स्पर्धा करने के स्थान पर अपने ही जीवन का निरीक्षण करने की प्रेरणा देती है। प्रत्येक दिन मनुष्य स्वयं से यह प्रश्न करे—
“क्या आज मैं कल की अपेक्षा अधिक संयमी, अधिक विनीत और अधिक सदाचारी बना हूँ?”
यदि प्रतिदिन थोड़ा-सा भी आत्मविकास होता रहे, तो कालान्तर में वही छोटे-छोटे परिवर्तन महान् व्यक्तित्व का निर्माण कर देते हैं।
अनुशासन ही वास्तविक स्वतन्त्रता है
बहुधा यह समझा जाता है कि अनुशासन मनुष्य की स्वतन्त्रता को सीमित कर देता है। परन्तु सत्य इसके विपरीत है। वास्तविक स्वतन्त्रता आत्मसंयम से ही प्राप्त होती है। अनुशासित विद्यार्थी विद्या में सफलता प्राप्त करता है। अनुशासित खिलाड़ी स्वस्थ एवं समर्थ शरीर का अधिकारी बनता है। अनुशासित कलाकार अपनी कला में उत्कृष्टता प्राप्त करताहै। इसी प्रकार अनुशासित मनुष्य का मन शान्त, स्थिर और प्रसन्न रहता है। जो अपनी इच्छाओं एवं इन्द्रियों पर शासन करना सीख लेता है, वह बाह्य परिस्थितियों का दास नहीं रहता। यही आत्मसंयम वास्तविक स्वतन्त्रता का स्वरूप है।
योग, ध्यान और स्वाध्याय का महत्त्व
भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण गीता में मनोनिग्रह एवं योग का विशेष महत्त्व प्रतिपादित करते हैं। योग शरीर को स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनाता है। ध्यान मन को स्थिर एवं शान्त करता है। ईश्वर-प्रार्थना से विनय एवं श्रद्धा का विकास होता है। सत्साहित्य के अध्ययन से विवेक जाग्रत होता है तथा नित्य आत्मचिन्तन से मनुष्य अपने दोषों को पहचानकर उनका परिमार्जनकर सकता है। ये साधन देखने में सरल प्रतीत होते हैं, किन्तु निरन्तर अभ्यास से यही मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का रूपान्तरण कर देते हैं।
वास्तविक आत्मोन्नति का लोकमंगल
सच्ची आत्मोन्नति केवल अपने तक सीमित नहीं रहती। जैसे-जैसे मनुष्य के भीतर ज्ञान, करुणा और विनय का विकास होता है, वैसे-वैसे उसका व्यवहार भी मधुर एवं हितकारी बनता जाता है। वह परिवार का श्रेष्ठ सदस्य, समाज का उत्तरदायी नागरिक, आदर्श शिक्षक, न्यायप्रिय नेता तथा विश्वसनीय सहकर्मी बनता है। उसका जीवन स्वयं प्रकाशमानहोकर दूसरों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। इस प्रकार एक व्यक्ति का आत्मपरिष्कार समाज के व्यापक कल्याण का कारण बनता है।
दैनिक जीवन में आत्मोन्नति के सरल उपाय
आत्मविकास के लिए निम्नलिखित साधनों का नियमित अभ्यास अत्यन्त उपयोगी है—
- प्रतिदिन कुछ समय ध्यान एवं ईश्वर-स्मरण करें।
- नित्य स्वाध्याय द्वारा ज्ञान की वृद्धि करें।
- क्रोध आने पर धैर्य एवं संयम का अभ्यास करें।
- सत्य, मधुरता और विनम्रता के साथ व्यवहार करें।
- शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम अथवा योग करें।
- बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के सेवा एवं परोपकार का अभ्यास करें।
- अपने प्रत्येक कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करें।
- रात्रि में आत्मपरीक्षण करें और स्वयं से पूछें—”क्या आज मैं कल की अपेक्षा एक श्रेष्ठ मनुष्य बना?”
प्रतिदिन किया गया यह अल्प प्रयास ही कालान्तर में महान् परिवर्तन का कारण बनता है। भगवद्गीता का संदेश अत्यन्त स्पष्ट है कि आत्मोन्नति का उद्देश्य केवल धन, पद, शक्ति अथवा प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं है। भगवद्गीता (६।५) में भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य को अपने ही पुरुषार्थ द्वारा अपना उत्थान करने की प्रेरणा देते हैं। संयमित मन उसका श्रेष्ठ मित्रबनता है, जबकि असंयमित मन ही उसके पतन का कारण बनता है। पुनः भगवद्गीता (१५।८) में वे यह स्मरण कराते हैं कि शरीर नश्वर है, किन्तु आत्मा की यात्रा अनन्त है। धन, सम्पत्ति, पद और प्रतिष्ठा यहीं रह जाते हैं, परन्तु ज्ञान, सदाचार, उत्तम संस्कार, आत्मसंयम तथा आध्यात्मिक प्रगति आत्मा के साथ आगे बढ़ते हैं। अतः आत्मोन्नति की सर्वोत्तमप्रेरणा क्षणिक सांसारिक सफलता नहीं, अपितु अपने चरित्र, संस्कार एवं चेतना का निरन्तर परिष्कार होना चाहिए। प्रत्येक शुभ विचार, प्रत्येक सत्कर्म, प्रत्येक सद्गुण, प्रत्येक नूतन ज्ञान तथा मन पर प्राप्त प्रत्येक विजय हमें उस आदर्श मनुष्य के निकट ले जाती है, जिसकी कल्पना श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में की है।वास्तविक विजय संसार पर अधिकार प्राप्तकरने में नहीं, अपितु अपने मन, अपनी इन्द्रियों और अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करने में है। यही आत्मोन्नति है, यही धर्म है और यही मनुष्य-जीवन की परम सफलता है।
