ज्ञान की उत्पत्ति: भारतीय दर्शन के छह स्कूल 

भारतीय दर्शन की परंपरा और षड्-दर्शन का उद्भव : 

भारतीय सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और भौतिक उपलब्धियों का इतिहास नहीं है, अपितु यह आत्मा की खोज, सत्य की जिज्ञासा और मोक्ष की साधना का इतिहास है। भारतभूमि ने मानवता को केवल जीवन जीने की कला ही नहीं सिखाई, बल्कि यह भी बताया कि जीवन का परम उद्देश्य क्या है। इसी गहन चिंतन, तपस्या और अनुभूति सेभारतीय दर्शन की महान परंपरा का जन्म हुआ। 

जहाँ अन्य सभ्यताओं में दर्शन मुख्यतः बौद्धिक या अकादमिक विमर्श तक सीमित रहा, वहीं भारत में दर्शन जीवन से अविच्छिन्न रहा। यहाँ दर्शन आश्रमों, वन-प्रदेशों, यज्ञशालाओं, गुरुकुलों और राजसभाओं में विकसित हुआ। यह केवल विचारों का खेल नहीं था, बल्कि जीवन को शुद्ध, सार्थक और मुक्त करने का साधन था। 

भारतीय दर्शन का अंतिम लक्ष्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि अज्ञान से मुक्ति और आत्मा की स्वतंत्रता (मोक्ष) था। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समय-समय पर विभिन्न दर्शनों का प्राकट्य हुआ, जो अंततः षड्-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित हुए— 

  1. सांख्य 
  1. योग 
  1. न्याय 
  1. वैशेषिक 
  1. मीमांसा 
  1. वेदांत 

इन छह दर्शनों को आस्तिक दर्शन कहा जाता है, क्योंकि ये सभी वेदों को प्रमाण रूप में स्वीकार करते हैं, यद्यपि उनकी व्याख्याएँ भिन्न-भिन्न हैं। 

१. सांख्य दर्शन : तत्वों की गणना और विवेक का प्रकाश 

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन की प्राचीनतम प्रणालियों में से एक है। इसके बीज ऋग्वेद और उपनिषदों में उपलब्ध होते हैं। महर्षि कपिल को इसका प्रवर्तक माना जाता है। यह दर्शन मानव जीवन में व्याप्त दुःख और बंधन की समस्या से उत्पन्न हुआ। 

उद्भव का कारण 

सांख्य दर्शन का उदय इस प्रश्न से हुआ— 

  • यह संसार दुःखमय क्यों है? 
  • चेतन आत्मा और जड़ पदार्थ में क्या भेद है? 
  • क्या ईश्वर के सहारे के बिना भी सृष्टि को समझा जा सकता है? 

मुख्य सिद्धांत 

सांख्य के अनुसार सृष्टि दो मूल तत्वों से बनी है— 

  • पुरुष (चेतन, द्रष्टा, शुद्ध आत्मा) 
  • प्रकृति (जड़, परिवर्तनशील, त्रिगुणात्मक) 

प्रकृति के तीन गुण—सत्त्व, रजस और तमस—संपूर्ण जगत की विविधता के कारण हैं। जब पुरुष और प्रकृति का विवेक हो जाता है, तब बंधन समाप्त होता है और कैवल्य (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। 

प्रभाव 

सांख्य दर्शन ने योग, बौद्ध और जैन दर्शनों को गहराई से प्रभावित किया। यह भारतीय चिंतन की विश्लेषणात्मक परंपरा का आधार है। 

२. योग दर्शन : साधना और आत्मसंयम का पथ 

योग दर्शन सांख्य का व्यावहारिक पक्ष है। यदि सांख्य ज्ञान देता है, तो योग उस ज्ञान को जीवन में उतारने की विधि सिखाता है। पतंजलि मुनि द्वारा रचित योगसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रंथ है। 

उद्भव का कारण 

  • मन की चंचलता और इंद्रियों की असंयमता 
  • यह अनुभव कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, अभ्यास अनिवार्य है 
  • तपस्वी परंपराओं का प्रभाव 

मुख्य शिक्षाएँ 

योग का अष्टांग मार्ग— 

  1. यम 
  1. नियम 
  1. आसन 
  1. प्राणायाम 
  1. प्रत्याहार 
  1. धारणा 
  1. ध्यान 
  1. समाधि 

योग का लक्ष्य है—चित्तवृत्तियों का निरोध। जब मन शांत होता है, तब आत्मा का साक्षात्कार होता है। 

प्रभाव 

योग भारत की आत्मा बन गया। आज यह संपूर्ण विश्व में स्वास्थ्य, शांति और आत्मविकास का माध्यम बन चुका है। 

३. न्याय दर्शन : तर्क और प्रमाण का विज्ञान 

न्याय दर्शन का प्रवर्तन महर्षि गौतम (अक्षपाद) ने किया। यह दर्शन सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए तर्कशक्ति को सर्वोपरि मानता है। 

उद्भव का कारण 

  • विभिन्न दर्शनों के बीच बढ़ता वैचारिक संघर्ष 
  • सत्य और असत्य में भेद करने की आवश्यकता 
  • शास्त्रार्थ और वाद-विवाद की परंपरा 

मुख्य सिद्धांत 

न्याय चार प्रमाण स्वीकार करता है— 

  1. प्रत्यक्ष 
  1. अनुमान 
  1. उपमान 
  1. शब्द 

अज्ञान को दूर कर सत्य ज्ञान प्राप्त करना ही मुक्ति का साधन है। 

प्रभाव 

न्याय दर्शन ने भारतीय तर्कशास्त्र, विधि और दर्शन को गहनता प्रदान की। 

४. वैशेषिक दर्शन : पदार्थ और परमाणु का विवेचन 

वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद माने जाते हैं। यह दर्शन सृष्टि की भौतिक संरचना को समझाने का प्रयास करता है। 

मुख्य शिक्षाएँ 

  • संसार परमाणुओं से बना है 
  • पदार्थों की श्रेणियाँ—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव 
  • वास्तविकता के ज्ञान से मोक्ष 

प्रभाव 

यह दर्शन भारत का प्राचीन वैज्ञानिक चिंतन प्रस्तुत करता है। 

५. मीमांसा दर्शन : कर्म और धर्म की प्रतिष्ठा 

मीमांसा दर्शन का उद्देश्य वेदों में वर्णित धर्म और यज्ञ की रक्षा करना है। जैमिनि इसके प्रवर्तक हैं। 

मुख्य सिद्धांत 

  • वेद अपौरुषेय और शाश्वत हैं 
  • यज्ञ से अपूर्व फल की उत्पत्ति होती है 
  • धर्म ही जीवन का आधार है 

प्रभाव 

मीमांसा ने हिंदू कर्मकांड, सामाजिक नियमों और धर्मशास्त्र को आकार दिया। 

६. वेदांत दर्शन : ब्रह्म और मोक्ष का तत्त्वज्ञान 

वेदांत भारतीय दर्शन की पराकाष्ठा है। इसका आधार उपनिषद, गीता और ब्रह्मसूत्र हैं। 

प्रमुख आचार्य 

  • शंकराचार्य – अद्वैत 
  • रामानुजाचार्य – विशिष्टाद्वैत 
  • मध्वाचार्य – द्वैत 

मुख्य शिक्षाएँ 

  • ब्रह्म ही परम सत्य है 
  • आत्मा और ब्रह्म का संबंध 
  • ज्ञान, भक्ति और कर्म द्वारा मोक्ष 

प्रभाव 

वेदांत ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को विश्वव्यापी बनाया। 

षड्-दर्शन का समन्वय 

ये दर्शन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के विभिन्न सोपान हैं— 

  • सांख्य विश्लेषण देता है 
  • योग साधना देता है 
  • न्याय तर्क देता है 
  • वैशेषिक विज्ञान देता है 
  • मीमांसा कर्म देता है 
  • वेदांत मोक्ष देता है 

उपसंहार 

षड्-दर्शन भारतीय मनीषा की अमूल्य धरोहर हैं। ये दर्शाते हैं कि भारत ने जीवन के प्रत्येक प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया—चाहे वह पदार्थ हो, मन हो, कर्म हो या परम सत्य। आज भी ये दर्शन मानवता को दिशा, शांति और मुक्ति प्रदान करने में सक्षम हैं। 

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