पतंजलि योगसूत्र – योग दर्शन का शाश्वत प्रकाश
भारतीय दर्शन और अध्यात्म के क्षेत्र में महर्षि पतंजलि का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्वितीय है। उन्होंने योग को केवल शारीरिक क्रियाओं या साधना तक सीमित न रखते हुए, उसे एक पूर्ण जीवन-पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। उनके द्वारा रचित ‘योगसूत्र’ एक अत्यंत संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली ग्रंथ है, जो योग के सिद्धांत, साधन, और लक्ष्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। पतंजलि योगसूत्र मात्र 196 सूत्रों का संकलन है, किंतु इसकी गहराई असीम है। यह ग्रंथ न केवल आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाने वाला मार्ग है, बल्कि मानसिक संतुलन, शांति और जीवन की उच्चतर गुणवत्ता की कुंजी भी है।
पतंजलि योगसूत्र का स्वरूप :
पतंजलि योगसूत्र को चार पादों (अध्यायों) में विभाजित किया गया है:
- समाधि पाद
- साधना पाद
- विभूति पाद
- कैवल्य पाद
१ समाधि पाद – सूत्र एवं हिंदी अर्थ
1. अथ योगानुशासनम्
अब योग का अनुशासनपूर्वक उपदेश किया जाता है।
2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
योग चित्त की वृत्तियों का निरोध (रोकना या नियंत्रण) है।
3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्
तब (वृत्तियों के निरोध के बाद) द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थित होता है।
4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र
अन्यथा (वृत्तियों के साथ) आत्मा उनका रूप धारण कर लेता है
5. वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः
वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं – क्लिष्ट (कष्टदायक) और अक्लिष्ट (अकष्टदायक)।
6. प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः
वे पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम – ये प्रमाण (सत्य ज्ञान) हैं।
8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्
विपर्यय वह मिथ्या ज्ञान है, जो वस्तु के वास्तविक स्वरूप के विपरीत होता है।
9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः
शब्द के आधार पर कल्पना की गई वस्तु का ज्ञान विकल्प कहलाता है।
10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा
निद्रा वह वृत्ति है, जिसका आधार अभाव (शून्यता) का अनुभव होता है।
11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः
पूर्व अनुभवों का न मिटने वाला प्रभाव स्मृति कहलाता है।
12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः
वृत्तियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।
13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः
चित्त की स्थिरता में किया गया प्रयास ही अभ्यास है।
14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः
वह अभ्यास दीर्घकाल, निरंतरता और श्रद्धा के साथ करने पर मजबूत होता है।
15.दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्
जो दृश्य और श्रुत विषयों में आसक्ति से मुक्त है, वह वैराग्य कहलाता है।
16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्
परम वैराग्य वह है, जिसमें पुरुष (आत्मा) के ज्ञान से गुणों की भी तृष्णा नहीं रहती।
17.वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः
वितर्क (तर्क), विचार, आनंद और अस्मिता (अहंभाव) से युक्त समाधि संप्रज्ञात कहलाती है।
18. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः
वैराग्य के अभ्यास से संस्कार शेष रह जाने पर जो समाधि होती है, वह असंप्रज्ञात होती है।
19. भक्तिपूर्वक वीतरागों का जन्म प्रकृतिलय से होता है।
(यह सूत्र कई पाठों में नहीं है; व्याख्याकार इसपर भिन्न मत रखते हैं।)
20. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्
अन्य साधकों के लिए श्रद्धा, वीर्य (प्रयास), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा आवश्यक हैं।
21. तीव्रसंवेगानामासन्नः
जो तीव्र संवेग वाले होते हैं, उनके लिए सिद्धि निकट होती है।
22. मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः
संवेग की तीव्रता भी मृदु, मध्यम और तीव्र होती है, जिससे परिणाम में भिन्नता होती है।
23. ईश्वरप्रणिधानाद्वा
या ईश्वरप्रणिधान (ईश्वर में पूर्ण समर्पण) से भी सिद्धि होती है।
24.क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः
ईश्वर विशेष पुरुष है जो क्लेश, कर्म, फल और संस्कार से परे है।
25. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्
ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज अनंत है।
26. स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्
ईश्वर काल से परे होने के कारण पूर्वजों के भी गुरु हैं।
27. तस्य वाचकः प्रणवः
उसका प्रतीक ‘ॐ’ (प्रणव) है।
28. तज्जपस्तदर्थभावनम्
‘ॐ’ का जप और उसके अर्थ का चिंतन करना चाहिए।
29.ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च
इससे अंतर्मुख चेतना की प्राप्ति और विघ्नों का नाश होता है।
30. व्याधि स्त्यान संशय प्रमाद आलस्य अविरति भ्रान्तिदर्शन अलब्धभूमिकत्व अनवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः
ये 9 चित्तविक्षेप (अवरोधक) हैं: बीमारी, आलस्य, संदेह, प्रमाद, विरति की कमी, भ्रांति, साधना न हो पाना, साधना से गिर जाना।
31. दुःख दौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः
इन विघ्नों के साथ दुःख, निराशा, शरीर में कंपकंपी और असंतुलन, श्वास-प्रश्वास की गति बढ़ जाती है।
32. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः
इन विघ्नों की निवृत्ति के लिए एक तत्व (ईश्वर या साध्य लक्ष्य) का अभ्यास करना चाहिए।
33.मैत्री करुणा मुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्
चित्त की शांति के लिए मैत्री (मित्रों के लिए), करुणा (दुखियों के लिए), मुदिता (सुखियों के लिए), और उपेक्षा (पापियों के लिए) की भावना रखनी चाहिए।
34. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य
प्राण के श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करने से चित्त शांत होता है।
37. वीतरागविषयं वा चित्तम्
वैराग्यशील व्यक्ति के चित्त पर ध्यान करके चित्त स्थिर किया जा सकता है।
38. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा
स्वप्न या निद्रा में जो ज्ञान होता है, उसका ध्यान करके भी स्थिरता संभव है।
39. यथाभिमतध्यानाद्वा
या किसी भी प्रिय विषय पर ध्यान करके चित्त को स्थिर किया जा सकता है।
40. परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः
साधक का चित्त सूक्ष्मतम से लेकर महत्तम तक के सब विषयों पर नियंत्रण पा सकता है।
41.क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः
जब वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं तो साधक का चित्त द्रष्टा, देखने की क्रिया और देखी गई वस्तु – तीनों में एकरस हो जाता है, जैसे स्वच्छ मणि सब प्रतिबिंब दर्शाता है।
42. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः
जब शब्द, अर्थ और ज्ञान मिलकर एक अवस्था बनाते हैं, तो वह सवितर्क समाधि होती है।
43.स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का
जब स्मृति शुद्ध हो जाती है और केवल वस्तु का स्वरूप प्रकट होता है, तो निर्वितर्क समाधि होती है।
44. एतेन सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता
इसी प्रकार सूक्ष्म विषयों की सविचार और निर्विचार समाधियाँ भी समझी जाती हैं।
45. सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्
सूक्ष्म विषय का अन्त अलींग (अव्यक्त) तक होता है।
46. ता एव सबीजः समाधिः
यह सबीज (बीजयुक्त) समाधि है।
47. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः
निर्विचार समाधि में निपुणता होने से आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
48. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा
उस अवस्था में ज्ञान सत्य से युक्त होता है।
49.श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्
यह प्रज्ञा श्रुति (शास्त्र) और अनुमान से भिन्न और विशिष्ट होती है।
50. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी
इस ज्ञान से उत्पन्न संस्कार अन्य (अवरोधक) संस्कारों को रोकता है।
51. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः
जब उस (ज्ञान के भी) संस्कार का निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि प्राप्त होती है।
२ साधन पाद – सूत्र एवं हिंदी अर्थ
1.तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः
तप, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) और ईश्वरप्रणिधान – ये क्रियायोग के तीन अंग हैं।
2.समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च
यह क्रियायोग समाधि प्राप्ति और क्लेशों के शमन के लिए है।
3. अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः
अविद्या, अस्मिता (अहंकार), राग, द्वेष और अभिनिवेश (मृत्यु का भय) – ये पाँच क्लेश हैं।
4.अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्
अविद्या ही अन्य क्लेशों का मूल क्षेत्र है – यह प्रसुप्त, तुच्छ, विच्छिन्न और प्रबल रूपों में होती है
5.अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या
अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख और अनात्मा को आत्मा मानना – यह अविद्या है।
6. दृष्टृदर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता
द्रष्टा और बुद्धि की एकता का बोध ही अस्मिता (अहंता) है।
7. सुखानुशयी रागः
सुख की स्मृति से उत्पन्न मोह राग कहलाता है।
8. दुःखानुशयी द्वेषः
दुःख की स्मृति से उत्पन्न विरोध द्वेष कहलाता है।
9. स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः
मृत्यु का भय, जो विद्वान में भी स्वाभाविक रूप से रहता है – वह अभिनिवेश है।
10.ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः
ये सूक्ष्म क्लेश अभ्यास से नष्ट किए जा सकते हैं।
11. ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः
क्लेशों की वृत्तियाँ ध्यान से हटाई जाती हैं।
12. क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः
कर्माशय (कर्मों का संग्रह) क्लेशों से उत्पन्न होता है – और वह वर्तमान व भविष्य जन्मों में फल देता है।
13. सति मूले तद्विपाको जात्यायुभोगाः
जब तक मूल (क्लेश) विद्यमान है, तब तक जन्म, आयु और भोग होते रहते हैं।
14. ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्
कर्मफल सुख या दुःखदायक होता है – क्योंकि वे पुण्य या पाप से उत्पन्न होते हैं।
15. परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः
परिणाम, ताप, संस्कार और गुणों के विरोध से विवेकी के लिए सब कुछ दुःखरूप होता है।
16. हेयं दुःखमनागतम्
आने वाला दुःख ही त्याज्य है।
17. दृष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतु:
द्रष्टा (पुरुष) और दृश्य (प्रकृति) का संयोग ही दुःख का कारण है।
18. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतरिन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्
प्रकाश (सत्त्व), क्रिया (रजस), स्थिति (तमस) से युक्त दृश्य पदार्थ (प्रकृति) पंचभूत और इन्द्रियों से बना है, जिसका उद्देश्य भोग और मुक्ति है।
19. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि
विशेष (स्थूल), अविशेष (सूक्ष्म), लिङ्गमात्र (बीज रूप) और अलिङ्ग (प्रकृति) – ये गुणों की अवस्थाएँ हैं।
20. द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः
द्रष्टा केवल दृष्टा है, शुद्ध होते हुए भी वह बुद्धि के प्रतिबिंब को देखता है।
21. तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा
दृश्य (प्रकृति) का अस्तित्व केवल द्रष्टा के लिए है।
22. कृतार्थं प्रतिनष्टं अपि अनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्
जिसका उद्देश्य पूरा हो चुका है, वह दृश्य वस्तु अन्य के लिए अभी भी विद्यमान है।
23. स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः
स्व (प्रकृति) और स्वामी (पुरुष) की शक्तियों की पहचान कराने वाला संयोग ही उनका कारण है।
24. तस्य हेतुरविद्या
इस संयोग का कारण अविद्या है।
25. तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशे कैवल्यम्
अविद्या की निवृत्ति से संयोग का अभाव होता है – यही मोक्ष (कैवल्य) है।
26. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः
अविचल विवेकज्ञान ही इस मोक्ष का उपाय है।
27. तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा
उस विवेकज्ञान की पूर्णता सात अवस्थाओं में होती है।
28.योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः
योग के अंगों का अभ्यास करने से अशुद्धियाँ दूर होती हैं और विवेक का प्रकाश होता है।
29. यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधयोऽष्टावङ्गानि
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – ये आठ अंग हैं।
30. अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह – ये पाँच यम हैं।
31. जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्
ये यम सभी जातियों, देशों, काल और परिस्थितियों में लागू होते हैं – ये महाव्रत हैं।
32. शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान – ये पाँच नियम हैं।
33. वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्
यदि कोई विघ्न उत्पन्न हो, तो उसका प्रतिपक्ष भाव (विपरीत विचार) करना चाहिए।
34. वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोदपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्
हिंसा आदि चाहे स्वयं की गई हो, कराई गई हो या अनुमोदित की गई हो – यदि लोभ, क्रोध, मोह आदि से प्रेरित हो – तो यह अनंत दुःख और अज्ञान का कारण बनती है। इसलिए उसका प्रतिपक्ष चिंतन करना चाहिए।
35. अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः
जब साधक अहिंसा में स्थित होता है, तो उसके आसपास वैर समाप्त हो जाता है।
36. सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्
जब सत्य में दृढ़ता आती है, तो वाणी में शक्ति उत्पन्न होती है – जो कहा जाए वह सत्य होता है।
37. अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्
जो चोर नहीं है (अस्तेय), उसके पास सभी रत्न (संपत्तियाँ) स्वतः आने लगती हैं।
38. ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः
ब्रह्मचर्य से तेज (वीर्य) की प्राप्ति होती है।
39. अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः
अपरिग्रह (संपत्ति का त्याग) से पूर्व जन्मों का ज्ञान होता है।
40. शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः
शरीर और मन की शुद्धि से अपने शरीर के दोषों से वितृष्णा और दूसरों के संपर्क से विरक्ति हो जाती है।
41. सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यता च
शौच से चित्त की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रिय-निग्रह और आत्मदर्शन की क्षमता प्राप्त होती है।
42. सन्तोषादनुत्तमसुखलाभः
संतोष से परम सुख की प्राप्ति होती है।
43. कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः
तप से शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि तथा अशुद्धियों का नाश होता है।
44. स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः
स्वाध्याय (शास्त्र पाठ) से ईष्ट देवता का साक्षात्कार होता है।
45. समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्
ईश्वरप्रणिधान (समर्पण) से समाधि की सिद्धि होती है।
46. स्थिरसुखमासनम्
जो आसन स्थिर और सुखद हो वही आसन है।
47. प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्
आसन सिद्धि प्रयत्न के शैथिल्य (सहजता) और अनंत में मन की एकाग्रता से होती है।
48. ततो द्वन्द्वानभिघातः
उससे साधक को द्वंद्वों (जैसे सर्दी-गर्मी, सुख-दुख) का असर नहीं होता।
49. तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः
जब आसन सिद्ध हो जाता है, तब श्वास-प्रश्वास की गति का नियमन प्राणायाम है।
50. बाह्याभ्यन्तरस्थम्भवृत्तिर्देशकालसङ्ख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः
प्राणायाम तीन प्रकार के होते हैं: बाह्य (श्वास रोकना), आभ्यंतर (अंदर रोकना), स्थम्भ (दोनों से मुक्त)। यह देश, काल और संख्या से दीर्घ या सूक्ष्म होता है।
51. बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः
जो बाह्य और आभ्यंतर दोनों से परे हो, वह चतुर्थ प्रकार का प्राणायाम है।
52. ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्
इससे चित्त पर पड़े अज्ञान का आवरण हट जाता है।
53. धारणा हेतुश्च योग्यता मनसः
प्राणायाम से मन धारणा (एकाग्रता ) के लिए योग्य बनता है।
54. स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः
जब इन्द्रियाँ विषयों से हटकर चित्त के स्वरूप में स्थित हो जाती हैं, तो उसे प्रत्याहार कहते हैं।
55. ततः परमा वश्यता इन्द्रियाणाम्
प्रत्याहार से इन्द्रियाँ पूरी तरह वश में आ जाती हैं।
(शेष अगले लेख में …..)
