भेल संहिता : आयुर्वेद का प्राचीन आधार-ग्रन्थ
आयुर्वेद भारतीय ऋषियों की दिव्य ज्ञान-परम्परा का अमूल्य उपहार है। यह केवल रोगों के उपचार का विज्ञान ही नहीं, अपितु स्वस्थ, संतुलित एवं धर्ममय जीवन का सम्पूर्ण मार्गदर्शक भी है। सहस्राब्दियों से यह मानव-कल्याण का पथ प्रशस्त करता आया है तथा आज भी अपनी वैज्ञानिकता एवं व्यावहारिकता के कारण सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षितकर रहा है।
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में कुछ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, जैसे—चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टाङ्गहृदयम्। किन्तु कुछ ऐसे ग्रन्थ भी हैं जो अपेक्षाकृत कम चर्चित होते हुए भी आयुर्वेद के इतिहास एवं सिद्धान्तों को समझने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। भेल संहिता ऐसा ही एक अनुपम ग्रन्थ है।
यह संहिता आयुर्वेद के आदिकालीन स्वरूप का परिचय कराती है तथा हमें यह ज्ञात कराती है कि प्राचीन भारत में स्वास्थ्य, रोग, आहार, जीवनशैली एवं चिकित्सा के विषय में किस प्रकार चिन्तन किया जाता था। यद्यपि काल के प्रवाह में इसका एक बड़ा भाग लुप्त हो गया, तथापि जो अंश आज उपलब्ध हैं, वे आयुर्वेद की प्राचीन ज्ञान-परम्परा के बहुमूल्यप्रमाण हैं।
आचार्य भेल का परिचय :
भेल संहिता के रचयिता आचार्य भेल आयुर्वेद के प्रख्यात आचार्यों में गिने जाते हैं। वे भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। आत्रेय ऋषि उस काल के विख्यात वैद्य एवं आयुर्वेदाचार्य थे, जिनके आश्रम में अनेक प्रतिभाशाली शिष्य चिकित्सा-विज्ञान का अध्ययन करते थे।
प्राचीन भारत में शिक्षा गुरुकुल-पद्धति द्वारा दी जाती थी। शिष्य गुरु के सान्निध्य में रहकर श्रवण, मनन, संवाद एवं प्रत्यक्ष अनुभव के माध्यम से ज्ञान अर्जित करते थे। आत्रेय ऋषि की शिक्षाएँ भी इसी प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित होती रहीं।
आत्रेय के प्रमुख शिष्यों में अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन सभी ने अपने गुरु की शिक्षाओं को अपने-अपने ढंग से संहिताबद्ध किया। भेल संहिता उसी ज्ञान-परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप है।
ऐतिहासिक महत्त्व :
विद्वानों के मतानुसार भेल संहिता की रचना लगभग एक सहस्र वर्ष ईसा पूर्व से पाँच सौ वर्ष ईसा पूर्व के मध्य हुई। यद्यपि इसके काल का निश्चित निर्धारण सम्भव नहीं है, तथापि यह निर्विवाद है कि यह आयुर्वेद के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थों में से एक है। इस ग्रन्थ का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह आयुर्वेद के विकासशील स्वरूप का परिचय देता है। इसमें अनेक ऐसे विचार एवं शब्दावली सुरक्षित हैं, जो बाद के ग्रन्थों में परिवर्तित या विस्तृत रूप में प्राप्त होती हैं। इस प्रकार भेल संहिता आयुर्वेद के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण सेतु है।
आयुर्वेदिक साहित्य में स्थान :
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों को सामान्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। प्रथम वर्ग में बृहत्त्रयी—चरक संहिता, सुश्रुत संहिता एवं अष्टाङ्गहृदयम्—आते हैं। द्वितीय वर्ग में भेल संहिता, हरीत संहिता तथा काश्यप संहिता जैसे ग्रन्थों का समावेश होता है। भेल संहिता का सम्बन्ध विशेषतः आत्रेय-परम्परा से है, जो कायचिकित्सा अर्थात् आन्तरिक रोगों केनिदान एवं उपचार पर केन्द्रित है। यही कारण है कि इसका चरक संहिता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है।
ग्रन्थ की संरचना :
भेल संहिता की रचना विभिन्न “स्थानों” अथवा विभागों में की गयी थी। वर्तमान में उपलब्ध भागों में मुख्यतः सूत्रस्थान, निदानस्थान, विमानस्थान, शरीरस्थान तथा चिकित्सास्थान सम्मिलित हैं। यद्यपि अनेक अध्याय अपूर्ण अवस्था में उपलब्ध हैं, तथापि शेष सामग्री से ग्रन्थ की मूल भावना तथा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
स्वास्थ्य की समग्र अवधारणा :
भेल संहिता स्वास्थ्य को केवल रोगों के अभाव के रूप में नहीं देखती। इसके अनुसार स्वस्थ वही है जिसके शरीर, मन, इन्द्रियाँ तथा आत्मिक चेतना में सामंजस्य विद्यमान हो।दोषों की समता, धातुओं का सम्यक् पोषण, मलों का उचित निष्कासन, सुदृढ़ पाचनशक्ति तथा मन की प्रसन्नता—ये सभी स्वास्थ्य के आवश्यक आधार हैं। इस प्रकार आयुर्वेदस्वास्थ्य को सम्पूर्ण जीवन के संतुलन के रूप में देखता है।
त्रिदोष सिद्धान्त :
भेल संहिता में वात, पित्त और कफ—इन तीन दोषों का विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है।
वात शरीर की समस्त गतियों का नियामक है। श्वास-प्रश्वास, संचार, संवेदन तथा स्नायु-क्रियाएँ इसके अधीन मानी गयी हैं।
पित्त पाचन, ऊष्मा, रूपान्तरण तथा बुद्धि की तीक्ष्णता का आधार है।
कफ शरीर को स्थिरता, स्निग्धता, शक्ति तथा संरक्षण प्रदान करता है।
जब ये दोष अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहते हैं, तब स्वास्थ्य बना रहता है; किन्तु अनुचित आहार-विहार, ऋतु-विपर्यय, मानसिक विकार अथवा असंयम के कारण इनमें असंतुलन उत्पन्न होने पर रोग जन्म लेते हैं।
अग्नि का महत्त्व :
भेल संहिता में अग्नि को जीवन का आधार माना गया है। यहाँ अग्नि का अर्थ केवल जठराग्नि नहीं, अपितु शरीर की समस्त पाचन एवं रूपान्तरण प्रक्रियाओं से है। ग्रन्थ के अनुसार प्रबल अग्नि स्वास्थ्य, उत्साह एवं दीर्घायु का कारण है, जबकि मन्द अथवा विकृत अग्नि रोगों की जननी है। अनेक रोगों का मूल कारण अनुचित आहार एवं दुर्बल पाचनशक्ति कोमाना गया है। आज भी आयुर्वेद का सम्पूर्ण चिकित्सा-विज्ञान अग्नि की इस अवधारणा को अत्यन्त महत्त्व प्रदान करता है।
रोगोत्पत्ति का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण :
भेल संहिता के अनुसार रोग आकस्मिक रूप से उत्पन्न नहीं होते। वे दीर्घकाल तक चलने वाले असंतुलन का परिणाम होते हैं। जब मनुष्य प्रकृति के नियमों की उपेक्षा करता है, अनुचित आहार-विहार अपनाता है अथवा मानसिक विकारों के वशीभूत होकर जीवन व्यतीत करता है, तब धीरे-धीरे दोषों में विकृति उत्पन्न होती है और रोग जन्म लेते हैं।
आयुर्वेद का यह दृष्टिकोण अत्यन्त वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत है। इसमें रोग को किसी दैविक दण्ड या रहस्यमय घटना के रूप में नहीं, बल्कि कारण एवं परिणाम की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में समझाया गया है।
रोगों के प्रमुख कारण :
भेल संहिता में अनेक ऐसे कारणों का वर्णन मिलता है जो रोगोत्पत्ति के मूल में होते हैं। अनुचित एवं परस्पर विरुद्ध आहार का सेवन, आवश्यकता से अधिक अथवा अत्यल्प भोजन करना, प्राकृतिक वेगों को रोकना, ऋतु के अनुकूल आचरण न करना, अत्यधिक चिन्ता, क्रोध, शोक तथा अनियमित दिनचर्या—ये सभी रोगों के प्रमुख कारण बताए गए हैं। ग्रन्थका स्पष्ट मत है कि मनुष्य स्वयं अपने स्वास्थ्य का निर्माता भी है और विनाशक भी। संयमित जीवन स्वास्थ्य प्रदान करता है, जबकि असंयम रोगों को आमन्त्रित करता है।
रोग की विकास-प्रक्रिया :
भेल संहिता में यह भी वर्णित है कि रोग किस प्रकार क्रमशः विकसित होता है। प्रारम्भ में दोषों में सूक्ष्म विकृति उत्पन्न होती है। यदि उस समय उचित सावधानी न बरती जाए तो वे बढ़कर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाते हैं। तत्पश्चात् वे किसी दुर्बल अंग अथवा धातु में आश्रय ग्रहण करते हैं और अन्ततः रोग के रूप में प्रकट होते हैं। यह सिद्धान्त आधुनिक चिकित्साविज्ञान के उस विचार से भी साम्य रखता है कि अधिकांश रोग धीरे-धीरे विकसित होते हैं और उनके प्रारम्भिक संकेतों को समय रहते पहचान लेना अत्यन्त आवश्यक है।
आहार का महत्त्व :
आयुर्वेद में आहार को जीवन का आधार कहा गया है। भेला संहिता में भी भोजन को औषधि के समान महत्त्व प्रदान किया गया है।ग्रन्थ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का आहार उसकी प्रकृति, आयु, ऋतु, पाचनशक्ति तथा कार्य-क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। जो भोजन एक व्यक्ति के लिए हितकर है, वही दूसरे के लिए अहितकर भी हो सकता है। भोजन सदैवशुद्ध, ताजा, सुपाच्य तथा संतुलित होना चाहिए। अत्यधिक भारी, बासी अथवा असंगत खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने गए हैं।भेल संहिता इस बात पर विशेष बल देती है कि भोजन केवल स्वाद की तृप्ति के लिए नहीं, अपितु शरीर एवं मन के पोषण के लिए किया जाना चाहिए।
विरुद्ध आहार से सावधानी :
ग्रन्थ में ऐसे अनेक खाद्य संयोजनों से बचने का निर्देश दिया गया है जो शरीर के लिए अहितकर हो सकते हैं। आयुर्वेद इन्हें “विरुद्ध आहार” कहता है। अनुचित संयोजन से दोषों में विकृति उत्पन्न होती है, पाचनशक्ति दुर्बल होती है तथा दीर्घकाल में अनेक रोगों का जन्म होता है। इसलिए भोजन करते समय केवल मात्रा ही नहीं, अपितु उसकी गुणवत्ता एवंसंगति पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
विहार एवं दिनचर्या :
स्वास्थ्य केवल आहार पर ही निर्भर नहीं करता। उचित विहार अर्थात् जीवनचर्या भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। भेल संहिता में समय पर सोने-जागने, शारीरिक श्रम करने, स्वच्छता बनाए रखने तथा नियमित दिनचर्या का पालन करने पर विशेष बल दिया गया है। अनियमित जीवन, रात्रि-जागरण, अत्यधिक आलस्य तथा असंतुलित व्यवहार को स्वास्थ्य के लिएहानिकारक बताया गया है। आयुर्वेद का मत है कि स्वस्थ जीवन कोई आकस्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि प्रतिदिन किए जाने वाले सदाचार एवं अनुशासन का परिणाम है।
मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्व :
भेल संहिता का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें मन एवं शरीर के घनिष्ठ सम्बन्ध को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है। ग्रन्थ में भय, क्रोध, शोक, लोभ, ईर्ष्या तथा अत्यधिक इच्छाओं को अनेक रोगों का कारण बताया गया है। मानसिक अशान्ति शरीर की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है और धीरे-धीरे रोगों को जन्म देती है।यह विचारआधुनिक मनोविज्ञान के उन निष्कर्षों से मेल खाता है, जिनमें मानसिक तनाव को अनेक शारीरिक रोगों का कारण माना गया है।
मनःशान्ति के उपाय :
भेल संहिता के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु आत्मसंयम, सद्विचार, सत्संग, धर्माचरण तथा शान्तिपूर्ण जीवन अत्यन्त आवश्यक हैं। मनुष्य को क्रोध, लोभ एवं अहंकार जैसे विकारों से बचना चाहिए तथा जीवन में संतोष एवं कृतज्ञता का भाव विकसित करना चाहिए। ऐसा करने से मन स्थिर एवं प्रसन्न रहता है, जो स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकताहै।
चिकित्सा का मूल सिद्धान्त :
भेल संहिता का मत है कि प्रत्येक रोगी विशिष्ट होता है। इसलिए सभी व्यक्तियों के लिए एक समान उपचार उपयुक्त नहीं हो सकता। वैद्य को रोगी की प्रकृति, आयु, बल, ऋतु, रोग की अवस्था तथा मानसिक स्थिति का सूक्ष्म परीक्षण करके उपचार करना चाहिए। यही आयुर्वेद की व्यक्तिगत चिकित्सा-पद्धति का आधार है। आज के युग में जब व्यक्तिगतचिकित्सा (Personalized Medicine) की चर्चा हो रही है, तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया था।
औषधियों का स्वरूप :
भेल संहिता में वर्णित अधिकांश औषधियाँ वनस्पति-आधारित हैं। विभिन्न जड़ी-बूटियों, मूलों, पत्रों, फलों तथा प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग रोगों के उपचार में किया गया है। इन औषधियों का उद्देश्य केवल रोग का दमन करना नहीं, बल्कि शरीर के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करना है। यही आयुर्वेद की विशिष्टता है।
सेवा-भाव ही चिकित्सा का प्राण :
भेला संहिता में चिकित्सा को केवल व्यवसाय नहीं, अपितु लोकसेवा एवं धर्म का कार्य माना गया है। रोगी की पीड़ा को दूर करना वैद्य का सर्वोच्च कर्तव्य बताया गया है। वैद्य को करुणाशील, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान, स्वच्छ आचरण वाला तथा लोभ से रहित होना चाहिए। उसे सभी रोगियों के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए तथा उपचार में पूर्ण निष्ठा एवं समर्पणका परिचय देना चाहिए। यह आदर्श आज भी चिकित्सा-जगत् के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था।
भेल संहिता का पुनः आविर्भाव :
कालचक्र के प्रभाव से अनेक प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो गए। भेल संहिता भी दीर्घकाल तक ऐसी ही दुर्लभ कृति मानी जाती रही। अनेक शताब्दियों तक इसका उल्लेख तो अन्य आयुर्वेदिक ग्रन्थों में मिलता रहा, किन्तु मूल ग्रन्थ सामान्य जन एवं विद्वानों की पहुँच से दूर रहा। आधुनिक काल में ताड़पत्रों पर लिखित इसकी कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुईं। तत्पश्चात् विद्वानों ने उनका अध्ययन, सम्पादन एवं तुलनात्मक परीक्षण करके उपलब्ध सामग्री को पुनः प्रकाशित किया। यद्यपि आज भी यह ग्रन्थ पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है, तथापि इसके संरक्षित अंश आयुर्वेद के इतिहास की अमूल्य निधि हैं। वस्तुतः भेल संहिता का पुनः प्रकाश में आना भारतीय ज्ञान-परम्परा के लिए अत्यन्त हर्ष एवं गौरव का विषय है।
आयुर्वेद के इतिहास में महत्त्व :
भेल संहिता केवल एक चिकित्सा-ग्रन्थ नहीं है, अपितु भारतीय चिकित्सा-विज्ञान के विकास का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। इससे ज्ञात होता है कि हमारे ऋषि रोगों के कारणों, स्वास्थ्य के सिद्धान्तों तथा चिकित्सा-पद्धतियों पर कितनी गम्भीरता से विचार करते थे। ग्रन्थ में तर्क, निरीक्षण, अनुभव तथा व्यावहारिक ज्ञान का सुन्दर समन्वयदिखाई देता है। यह संहिता हमें उस युग की झलक प्रदान करती है जब आयुर्वेद अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था और निरन्तर विकसित हो रहा था। इस दृष्टि से यह चिकित्सा-इतिहास के अध्येताओं, शोधकर्ताओं तथा आयुर्वेद के विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
आधुनिक युग के लिए संदेश :
वर्तमान समय में मानव जीवन अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। अनियमित दिनचर्या, असंतुलित आहार, मानसिक तनाव, प्रदूषित वातावरण तथा प्रकृति से बढ़ती दूरी के कारण अनेक नवीन रोग उत्पन्न हो रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में भेल संहिता का संदेश अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह हमें स्मरण कराती है कि स्वास्थ्य का आधार बाह्य साधनों में नहीं, अपितु संतुलित जीवन-पद्धति में निहित है। ग्रन्थ का स्पष्ट संकेत है कि यदि मनुष्य अपने आहार, विहार, विचार तथा आचार को शुद्ध एवं संतुलित रखे तो अनेक रोगों से सहज ही बचा जा सकता है।
रोग-निवारण से अधिक रोग-प्रतिषेध :
भेल संहिता का एक प्रमुख संदेश यह है कि रोग उत्पन्न होने के पश्चात् उसके उपचार की अपेक्षा रोग की रोकथाम अधिक महत्त्वपूर्ण है। आज सम्पूर्ण विश्व “प्रिवेन्टिव हेल्थकेयर” अर्थात् रोग-प्रतिषेध की ओर अग्रसर है। आश्चर्य की बात है कि भारतीय ऋषियों ने यह सिद्धान्त हजारों वर्ष पूर्व ही प्रतिपादित कर दिया था। नियमित जीवनचर्या, ऋतु केअनुकूल आहार-विहार, मानसिक संयम, स्वच्छता तथा सदाचार—ये सभी रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले प्राकृतिक उपाय बताए गए हैं।
मन, शरीर और आत्मा का समन्वय :
भेल संहिता का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक है। यह मनुष्य को केवल शरीर नहीं मानती, बल्कि शरीर, मन और आत्मा का समन्वित स्वरूप मानती है। जब मन अशान्त होता है, तब शरीर भी प्रभावित होता है; और जब शरीर रोगग्रस्त होता है, तब मन की प्रसन्नता भी नष्ट हो जाती है। अतः वास्तविक स्वास्थ्य तभी सम्भव है जब जीवन के सभी पक्षों में संतुलनस्थापित हो। यही कारण है कि आयुर्वेद केवल औषधि पर बल नहीं देता, बल्कि सदाचार, आत्मसंयम, आध्यात्मिकता तथा मानसिक शुद्धि को भी स्वास्थ्य का आवश्यक अंग मानता है।
सनातन ज्ञान की अमूल्य धरोहर :
भेल संहिता भारतीय ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि, वैज्ञानिक चिन्तन एवं लोकमंगल की भावना का अनुपम प्रमाण है। यद्यपि यह ग्रन्थ आज पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है, तथापि इसके शेष अंश भी आयुर्वेद की महान परम्परा का परिचय देने के लिए पर्याप्त हैं। यह ग्रन्थ हमें बताता है कि प्राचीन भारत में चिकित्सा केवल रोग-निवारण का साधन नहीं थी, बल्कि मानवजीवन को स्वस्थ, संतुलित एवं सार्थक बनाने का एक समग्र विज्ञान थी। यद्यपि भेल संहिता को चरक संहिता अथवा सुश्रुत संहिता जैसी व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हुई, तथापि इसका महत्त्व किसी प्रकार से कम नहीं आँका जा सकता। यह आयुर्वेद के प्रारम्भिक स्वरूप, उसके मूल सिद्धान्तों तथा ऋषियों की गहन चिकित्सा-दृष्टि का अमूल्य दर्पण है। आजजब मानव समाज शारीरिक एवं मानसिक असंतुलन की अनेक समस्याओं से जूझ रहा है, तब भेला संहिता का सन्देश और भी अधिक सार्थक हो उठता है। यह हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य का रहस्य बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि संयमित जीवन, शुद्ध आहार, संतुलित विचार तथा प्रकृति के नियमों के अनुरूप आचरण में निहित है।निस्सन्देह, भेला संहिताआयुर्वेदिक ज्ञान की एक ऐसी मौन किन्तु सशक्त धारा है, जो सहस्राब्दियों से मानवता का पथ आलोकित करती चली आ रही है और भविष्य में भी करती रहेगी।
