भेल संहिता : आयुर्वेद का प्राचीन आधार-ग्रन्थ
भारतीय संस्कृति की महानतम देनों में आयुर्वेद का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह केवल रोगों की चिकित्सा का विज्ञान नहीं, अपितु स्वस्थ, दीर्घ एवं संतुलित जीवन का समग्र दर्शन है। मानव जीवन के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक कल्याण का जो समन्वित स्वरूप आयुर्वेद में प्राप्त होता है, वह विश्व की अन्य चिकित्सा-पद्धतियों में विरल है। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टाङ्गहृदयम् का विशेष स्थान है। किन्तु इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे प्राचीन ग्रन्थ भी हैं, जो यद्यपि अपेक्षाकृत कम चर्चित हैं, तथापि आयुर्वेद के इतिहास एवं विकास को समझने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। भेल संहिता ऐसा ही एक दुर्लभ एवं बहुमूल्य ग्रन्थ है। यह संहिता आयुर्वेद केप्रारम्भिक स्वरूप का परिचय कराती है तथा हमें यह समझने में सहायता देती है कि प्राचीन भारत में स्वास्थ्य, रोग, आहार, जीवनचर्या और चिकित्सा के विषय में किस प्रकार का चिन्तन विद्यमान था। यद्यपि काल के प्रवाह में इसका बहुत-सा भाग नष्ट हो गया, तथापि उपलब्ध अंश आज भी आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की गौरवपूर्ण गाथा सुनाते हैं।
आचार्य भेल का परिचय
भेल संहिता के रचयिता आचार्य भेल आयुर्वेद के प्रतिष्ठित आचार्यों में गिने जाते हैं। वे भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। आत्रेय ऋषि उस युग के विख्यात चिकित्सक एवं अध्यापक थे, जिनके आश्रम में अनेक प्रतिभाशाली शिष्य आयुर्वेद का अध्ययन करते थे। प्राचीन भारत में शिक्षा गुरुकुल-पद्धति द्वारा प्रदान की जाती थी। शिष्य गुरु केसमीप रहकर श्रवण, मनन, चर्चा, निरीक्षण तथा व्यवहारिक अभ्यास के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते थे। आत्रेय ऋषि की शिक्षाएँ भी इसी परम्परा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित हुईं। आत्रेय के प्रमुख शिष्यों में अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण तथा पराशर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन सभी ने अपने गुरु के उपदेशों को अपने-अपने ढंग सेसंहिताबद्ध किया। भेला संहिता इसी परम्परा की एक अमूल्य कड़ी है।
ऐतिहासिक महत्त्व
विद्वानों के मतानुसार भेल संहिता की रचना लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के मध्य हुई। यद्यपि इसका निश्चित काल निर्धारित करना कठिन है, तथापि यह स्पष्ट है कि यह आयुर्वेद के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थों में से एक है।इस ग्रन्थ का विशेष महत्त्व इसलिए है कि यह आयुर्वेद के विकासशील स्वरूप को प्रस्तुत करता है। इसमें अनेक ऐसे विचार, सिद्धान्त और शब्दावली सुरक्षित हैं, जो बाद के ग्रन्थों में अधिक व्यवस्थित एवं विकसित रूप में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार भेला संहिता आयुर्वेद के इतिहास को समझने का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों में बृहत्त्रयी—चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टाङ्गहृदयम्—का सर्वोच्च स्थान है। इनके अतिरिक्त भेल संहिता, हरीत संहिता तथा कश्यप संहिता जैसी प्राचीन संहिताएँ भी आयुर्वेदिक साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।भेल संहिता का सम्बन्ध मुख्यतः आत्रेय-परम्परा से है, जो कायचिकित्सा अर्थात् आन्तरिक रोगों के निदान एवं उपचार पर विशेष बल देती है। यहीकारण है कि इसका चरक संहिता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध दिखाई देता है।
ग्रन्थ की संरचना
भेल संहिता विभिन्न “स्थानों” अथवा विभागों में विभाजित थी। वर्तमान में उपलब्ध अंशों में सूत्रस्थान, निदानस्थान, विमानस्थान, शरीरस्थान तथा चिकित्सास्थान प्रमुख हैं।यद्यपि अनेक अध्याय अपूर्ण अवस्था में उपलब्ध हैं, तथापि जो सामग्री सुरक्षित है, वह ग्रन्थ की मूल भावना और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण को समझने के लिए पर्याप्त है।भेला संहिता केअनुसार स्वास्थ्य केवल रोगों के अभाव का नाम नहीं है। वास्तविक स्वास्थ्य वह है जिसमें शरीर, मन, इन्द्रियाँ तथा आत्मिक चेतना संतुलित एवं प्रसन्न हों। दोषों की समता, धातुओं का समुचित पोषण, मलों का उचित निष्कासन, पाचनशक्ति की सुदृढ़ता तथा मन की प्रसन्नता—ये सभी स्वास्थ्य के आधार हैं। इस प्रकार आयुर्वेद स्वास्थ्य को सम्पूर्ण जीवनके संतुलन के रूप में देखता है।
त्रिदोष सिद्धान्त
भेल संहिता में वात, पित्त एवं कफ—इन तीन दोषों का विस्तृत विवेचन मिलता है। वात शरीर की समस्त गतियों का नियामक है। पित्त पाचन, रूपान्तरण एवं ऊष्मा का आधार है। कफ शरीर को स्थिरता, बल एवं संरक्षण प्रदान करता है।जब ये दोष संतुलित रहते हैं, तब स्वास्थ्य बना रहता है; किन्तु इनके असंतुलित होने पर रोग उत्पन्न होते हैं। अनुचितआहार, असंयमित जीवनचर्या, ऋतु-विपर्यय तथा मानसिक विकार दोषों को विकृत कर देते हैं। भेल संहिता में अग्नि को जीवन का मूल आधार माना गया है। यहाँ अग्नि का अर्थ केवल जठराग्नि नहीं, बल्कि शरीर की समस्त पाचन एवं रूपान्तरण प्रक्रियाओं से है। प्रबल अग्नि स्वास्थ्य, उत्साह एवं दीर्घायु प्रदान करती है, जबकि मन्द अग्नि अनेक रोगों काकारण बनती है। ग्रन्थ के अनुसार अधिकांश रोगों की जड़ पाचनशक्ति की विकृति में निहित होती है।
रोगोत्पत्ति का सिद्धान्त
भेल संहिता रोग को आकस्मिक घटना नहीं मानती। इसके अनुसार रोग दीर्घकाल तक चलने वाले असंतुलन का परिणाम है। जब मनुष्य प्रकृति के नियमों की उपेक्षा करता है, अनुचित आहार-विहार अपनाता है तथा मानसिक विकारों के अधीन जीवन व्यतीत करता है, तब धीरे-धीरे दोषों में विकृति उत्पन्न होती है और रोग जन्म लेते हैं।
रोगों के प्रमुख कारण
ग्रन्थ में अनेक कारणों का उल्लेख मिलता है—
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विरुद्ध एवं अनुचित आहार
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आवश्यकता से अधिक अथवा अत्यल्प भोजन
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प्राकृतिक वेगों का दमन
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ऋतु के अनुसार जीवनचर्या का पालन न करना
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क्रोध, शोक, भय एवं चिन्ता
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अनियमित दिनचर्या
इन कारणों से दोषों का संतुलन बिगड़ता है और रोगों का विकास प्रारम्भ हो जाता है।भेल संहिता में रोग की क्रमिक उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। प्रारम्भ में दोषों में सूक्ष्म विकृति उत्पन्न होती है। बाद में वे शरीर में फैलते हैं और किसी दुर्बल अंग अथवा धातु में जाकर स्थित हो जाते हैं। इसके पश्चात् रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।यह विचार आयुर्वेद कीगहन निरीक्षण-शक्ति का परिचायक है।
आहार का महत्त्व
भेल संहिता में भोजन को औषधि के समान महत्त्व दिया गया है। ग्रन्थ के अनुसार आहार व्यक्ति की प्रकृति, आयु, ऋतु तथा पाचनशक्ति के अनुरूप होना चाहिए। भोजन शुद्ध, ताजा, सुपाच्य एवं संतुलित होना चाहिए। अत्यधिक भोजन, बासी भोजन तथा असंगत खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया है। आयुर्वेद का मत है किउचित आहार अनेक रोगों से रक्षा करता है और अनुचित आहार रोगों का प्रमुख कारण बनता है।
विहार एवं दिनचर्या
स्वास्थ्य केवल आहार पर निर्भर नहीं करता। उचित जीवनचर्या भी उतनी ही आवश्यक है।भेला संहिता में समय पर सोना-जागना, शारीरिक श्रम करना, स्वच्छता बनाए रखना तथा नियमित दिनचर्या का पालन करने का निर्देश दिया गया है। अनियमित जीवन, रात्रि-जागरण तथा आलस्य को स्वास्थ्य का शत्रु माना गया है।
मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्व
भेल संहिता का एक अत्यन्त उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें मानसिक स्वास्थ्य को विशेष महत्त्व दिया गया है। भय, क्रोध, शोक, लोभ, ईर्ष्या तथा अत्यधिक इच्छाओं को अनेक रोगों का कारण बताया गया है। मानसिक अशान्ति शरीर को भी प्रभावित करती है और अनेक व्याधियों को जन्म देती है। इस प्रकार आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पूर्व ही मन एवं शरीर केपरस्पर सम्बन्ध को पहचान लिया था। ग्रन्थ के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु आत्मसंयम, सद्विचार, धर्माचरण, सत्संग तथा संतोष आवश्यक हैं। जो मनुष्य अपने मन को वश में रखता है, वह अनेक शारीरिक एवं मानसिक रोगों से सुरक्षित रहता है।
चिकित्सा का सिद्धान्त
भेल संहिता का मत है कि प्रत्येक रोगी भिन्न होता है। अतः सभी रोगियों के लिए एक समान उपचार उपयुक्त नहीं हो सकता। वैद्य को रोगी की प्रकृति, आयु, बल, ऋतु, रोग की अवस्था तथा मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर उपचार करना चाहिए। यह व्यक्तिगत चिकित्सा-पद्धति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
औषधियों का स्वरूप
भेल संहिता में मुख्यतः वनस्पति-आधारित औषधियों का वर्णन मिलता है। विभिन्न जड़ी-बूटियों तथा प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग रोगों के उपचार हेतु किया जाता था। इनका उद्देश्य केवल रोग को दबाना नहीं, बल्कि शरीर के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करना था।
वैद्य का आचार-धर्म
भेल संहिता में वैद्य के चरित्र पर विशेष बल दिया गया है। वैद्य को करुणाशील, सत्यनिष्ठ, धैर्यवान तथा लोभ से रहित होना चाहिए। चिकित्सा को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि मानव-सेवा और धर्म का कार्य माना गया है। रोगी की पीड़ा का निवारण ही वैद्य का सर्वोच्च कर्तव्य बताया गया है।
भेला संहिता का पुनः आविर्भाव
दीर्घकाल तक भेल संहिता को लुप्त ग्रन्थ माना जाता रहा। आधुनिक काल में इसकी कुछ प्राचीन पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुईं, जिनके आधार पर विद्वानों ने इसका पुनः सम्पादन एवं प्रकाशन किया। यद्यपि आज भी यह पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है, तथापि इसके अवशिष्ट अंश आयुर्वेद के इतिहास की अमूल्य निधि हैं।
आधुनिक युग में प्रासंगिकता
आज का मानव तनाव, अनियमित जीवनचर्या, प्रदूषित वातावरण तथा असंतुलित आहार के कारण अनेक रोगों से ग्रस्त है। ऐसे समय में भेल संहिता का संदेश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह हमें स्मरण कराती है कि स्वास्थ्य का रहस्य औषधियों में नहीं, बल्कि संतुलित जीवन में निहित है। रोगों की रोकथाम, उचित आहार, मानसिक शान्ति, आत्मसंयमतथा प्रकृति के अनुकूल जीवन—ये सभी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही उपयोगी हैं जितनी सहस्रों वर्ष पूर्व थीं।यद्यपि भेला संहिता को चरक संहिता जैसी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हुई, तथापि इसका ऐतिहासिक एवं वैद्यकीय महत्त्व अत्यन्त महान है। यह आयुर्वेद के प्रारम्भिक स्वरूप, ऋषियों की गहन चिकित्सा-दृष्टि तथा मानव-कल्याण की उनकी उदात्त भावना काजीवंत प्रमाण है। भेला संहिता हमें यह सिखाती है कि स्वास्थ्य का आधार संयमित जीवन, शुद्ध आहार, संतुलित विचार तथा प्रकृति के नियमों के अनुरूप आचरण में निहित है। निस्सन्देह यह ग्रन्थ आयुर्वेदिक ज्ञान की एक ऐसी शांत किन्तु शक्तिशाली धारा है, जो आज भी मानवता का पथ आलोकित कर रही है।
